जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा के हाल में हुए प्रदर्शनों को आक्रामक नज़र आ रहे राहुल गाँधी के साथ जोड़ा जाए तो यह एक संकटग्रस्त देश की चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह नरेंद्र मोदी की सरकार है, जो अचानक किसी जहाज़ की तरह भँवर में फँसी हुई नज़र आ रही है। मामला इतना गंभीर है कि काकभुशुंडियों और शकुनियों ने आज नहीं तो कल होने वाले पतन की भविष्यवाणियाँ करनी शुरू कर दी है।
इन घटनाओं का जश्न हालाँकि थोड़ी सतर्कता के साथ मनाना चाहिए। जंतर मंतर के जन-उभार ने सरकार के लिए संकट के एक दौर को निश्चित रूप से ट्रिगर किया है पर अगर धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के समर्थकों को अर्थपूर्ण जीत हासिल करनी है तो निर्धारित उद्देश्यों के साथ एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा करना ही होगा।
हाल का घटनाक्रम हिंदुत्व परतंत्र के पैरालिसिस पर एक गंभीर अध्ययन की माँग करता है जो इसकी विचारधारा के लिए ही खतरा बन चुका है। यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह लोकतंत्र को पुनर्जीवित करने के कार्यभार से जुड़ा हुआ है।
राज्य के सभी उपकरण, मीडिया और लोकतांत्रिक संस्थानों पर मजबूत पकड़ होने के बावजूद सरकार के लिए अचानक आये इस मोड़ को तर्कसंगत बताना निश्चित ही मुश्किल होगा। प्रोपेगंडा मशीनरी भी इस धुंध को छाँट पाने में विफल हुई है।
मोदी राज को संचालित करने वाली विचारधार का पतन
जनता को आपस में बाँटने की सारी कोशिशें अब मुँह की खा रहीं है। वजह यह कि इस संकट के पीछे संरचनाएँ कम और उस विचारधारा के पतन के संकेत ज्यादा हैं जो मोदी शासन की संचालक शक्ति है। यह विचारधारा अपना आकर्षण खो चुकी है। मानो या न मानो, आरएसएस ब्रैंड हिंदुत्व अपने सबसे मुश्किल दौर में है।
बुद्धिजीवियों में इसकी दीर्घायु और वांछनीयता हमेशा एक सवाल रही थी, लेकिन जनता भी अब सोचने लगी है कि क्या राजनीति धार्मिक उसूलों से चल सकती है। क्या विचारधाराएँ छल का सहारा लेकर जिंदा रह सकती है? क्या कपट और दोमुँहापन इसे खाद- पानी देने के लिए काफी हैं?
पश्चिम में दक्षिणपंथियों ने इन्हीं विचारों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक-आर्थिक खुशहाली और एक सामंजस्यमय दुनिया के इर्द-गिर्द ईजाद किया था। फ़ासीवाद इसका चरम रूप था। हिंदुत्व ने इसकी नक़ल की लेकिन खुद को नफरत की राजनीति के आगे नहीं ले जा पायी।
क्या वजह है कि मंझे हुए नैरेटिव निर्माताओं के लिए नए विषय और भटकाने वाले मुद्दे ढूंढना मुश्किल हो गया है? लाखों करोड़ों रुपए से बनी प्रोपेगेंडा मशीनरी का इंजन क्यों ठप्प पड़ रहा है? विपक्षियों के नकारात्मक चित्रण की सारी कोशिशें क्यों विफल हो रही है? इसका जवाब हिंदुत्व की वैचारिक संरचना में निहित है।
श्रेष्ठता और प्रभुत्व के पुराने पड़ चुके विचार आधुनिक चुनौतियों का सामना कैसे कर सकते हैं? सौ वर्षों तक इसका जिंदा रह पाना भी अपने आप में एक चमत्कार है। हिंदुत्व की विचारधारा के इतने लंबे समय तक जीवित रहने की वजह इसकी दार्शनिक शक्ति में नहीं अपितु अपनी अंतर्वस्तु पर पर्दा डाले रखने में है। यह समय के अनुसार कभी यह तो कभी वह लोकप्रिय रूप अपना सकती है।
इसका सबसे अच्छा उदाहरण आजादी के संघर्ष में मिलता है। आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों ही आज़ादी के संघर्ष से अंत तक अलग रहे। और दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना में सैनिकों की भर्ती करने के लिए ब्रिटिशर्स को सहयोग भी दिया। विभाजन से कुछ साल पहले हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मुस्लिम बाहुल्य राज्यों में सरकारें भी बनाई। लेकिन इनमें से कोई भी कृत्य हिन्दुत्ववादी संगठनों को खुद को देशभक्ति या अखंड भारत का झंडाबरदार कहने से नहीं रोकता है।
यही दोमुँहापन अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ पूर्ण विलय की इसकी माँग में भी दिखता है। हिंदुत्ववादी ताकतें जम्मू कश्मीर के शासक राजा हरि सिंह के साथ मिली हुई थी, जो राज्य को स्वतंत्र बनाए रखना चाहत था, और जिससे भारत के साथ इसके विलय में देरी हुई। शेख अब्दुल्लाह के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक नेतृत्व के तले राज्य भारत के साथ मिल पाया।
जिस संकट से प्रधानमंत्री मोदी आज जूझ रहे हैं उसका मूल हिंदुत्व की विचारधारात्मक सीमाओं में है। इसे हम आज मनुस्मृति पर चल रही बहस में देख सकते हैं। पुणे में हुई लड़कियों की रैली में राहुल गाँधी द्वारा पितृसत्ता पर चोट करने के आह्वान ने मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
भाजपा अपनी पुरानी चाल यानी धर्म की आड़ लेकर और मनुस्मृति के ख़िलाफ़ विरोध को हिन्दू धर्म पर हमला बताकर इससे बच नहीं सकती है। गोलवलकर, जो आरएसएस के सबसे लंबी अवधि तक सचिव रहे, मनु को सबसे महान न्यायदाता मानते है और संविधान निर्माताओं द्वारा मनु को अनदेखा कर पश्चिम से प्रेरित संविधान अपनाने के लिए उनकी भर्त्सना करते हैं।
हालाँकि, यह रात को दिन बताने में तुली हुई है और उस किताब के प्रचार में लगी है जो अद्विज जातियों और औरतों के दमन का समर्थन करने के लिए कुख्यात है। यह उनके ख़िलाफ़ हिंसा का अनुमोदन भी करती है। महात्मा फुले और डॉक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर, दोनों ने ही इसे जातिगत भेदभाव और हिंसा का स्रोत पाया। 1927 में डॉक्टर अम्बेडकर ने इसे जला तक दिया था।
एक ओर आरएसएस और भाजपा एक समतामूलक समाज बनाने का ढोंग करते हैं और दूसरी ओर वे मनुस्मृति की हिफाज़त भी करते हैं। जाति व्यवस्था की गुलामी से खुद को आज़ाद करने की कोशिश करने वाला कोई भी व्यक्ति इस पाखंड को कैसे बर्दाश्त कर सकता है?
इस पुस्तक के औपनिवेशिक संबंध भी उतना ही महत्व रखते हैं। माना जाता है कि यह दूसरी सदी ईसवी में तैयार की गई थी और ब्रिटिशर्स द्वारा सबसे पहले खोजे तथा अनूदित ग्रंथों में से एक थी। सर विलियम जोन्स ने 1794 में इसका अनुवाद किया था। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसका इस्तेमाल उनके अधीन क्षेत्रों के निवासियों के लिए कानून बनाने के लिए किया था।
इससे उन्हें लोगों को श्रेणियों में बाँटने और जाति पदानुक्रम को सुदृढ़ करने में मदद मिली। ब्रिटिशर्स की ही तरह आरएसएस भी इस पुस्तक द्वारा जाति पदानुक्रम, जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा का अनुमोदन करने के लिए इसकी प्रशंसा करती है।
संघ और भाजपा को अपनी विचारधारा में बदलाव की ज़रूरत पिछले कुछ दशकों में ही समझ लेनी चाहिए थी। अटल बिहारी वाजपाई ने उनकी विचारधारा के मुख्य अवयवों के साथ समझौता जरूर किया लेकिन मोदी ने उसे उसके मूल रूप में ला खड़ा किया।
हालाँकि सत्ताधारी खेमा इस उथल-पुथल को छिपाना चाहेगा, लेकिन मोदी और उनकी मुख्य टीम इन चिंताजनक संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। एक अड़ियल मंत्री का इस्तीफ़ा देने पर मजबूर होना और गृह मंत्री की इच्छा के विरुद्ध पैलेट गन से लगी चोट के मामले में एफआईआर दर्ज होना, सत्ता के नशे में चूर सरकार के लिए कोई सुखद अनुभव नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह राहुल गाँधी के नेतृत्व वाले आक्रामक विपक्ष के साथ मुठभेड़ से बचने के लिए ही संसद के मॉनसून सत्र से गायब रहे। इस वाकये ने सरकार के आत्म सम्मान पर कड़ा प्रहार किया होगा।
शायद हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए ये घटनाएँ काफी नहीं थी इसलिए संघ सचिव मोहन भागवत ने अपनी जंग लगी विचारधारा को वैश्विक स्तर पर बेचने का बीड़ा उठा लिया। अमेरिका का उनका दौरा इससे मुश्किल वक़्त पर नहीं हो सकता था। अमेरिका और कनाडा से मिला जबरदस्त प्रतिरोध इस बात का प्रमाण है कि सत्ता में इतने लंबे समय तक बने रहने के बावजूद वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को इम्प्रेस करने में अक्षम हैं।
भारत के विशगुरु होने का लम्बे समय से संजोया दावा, जो कि संघ के प्रचार का एक झुनझुना मात्र है, का बिना किसी जाँच के ही बहिष्कार हो रहा है।
हिंदुत्व की फूट डालो रणनीति के साथ अड़े रहना
उधार लिए नैरेटिव्स, संस्थागत हेर-फेर और इसके अनुयायी संगठनों द्वारा हिंसा की अनुपस्थिति में क्या हिंदुत्व जीवित रह सकता है? सांस्कृतिक श्रेष्ठता और मुसलमानों और ईसाइयों को उनकी ही ज़मीन पर ग़ैर बताने की अवधारणा नाज़ी दर्शन से ली हुई है। जाति पदानुक्रम पर आधारित पुरातन सामाजिक संरचना के लिए इसका समर्थन आधुनिक समाज की चुनौतियों का सामना कर पाएगा? 100 वर्षों का इसका इतिहास इसकी भटकाने वाली गप्प, जैसे सबके लिए विकास और खुशहाली और सबको 15 लाख जैसे जुमलों का ही गवाह है।
मोदी ने यही जादूगरी 2014 में दिखाई थी। उन्होंने सफलतापूर्वक एक ऐसी राजनीतिक छवि अपनाई जिसने उनकी असली राजनीति को छिपा दिया। गुजरात में उनका शासन 2002 में हुए नरसंहार के लिए कुख्यात है, और 12 सालों का उनका राज, उस राज्य को देश के तीसरे सबसे भूखे राज्यों में ले जा पहुँचा जहाँ सामाजिक आर्थिक अंतर का अनुपात बहुत अधिक हो गया।
1947 में विभाजन की बेचैनी से गुज़र रही हिंदू आबादी का संघ ने फायदा उठाया था। और 2014 में मनमोहन सरकार के शासन में बाहर आ रहे भ्रष्टाचार के मामलों से उपजी बेचैनी का। पूरे आत्मविश्वास के साथ गुजरात मॉडल बेचा गया और देश की आर्थिकी को चकरा देने वाली ऊँचाइयों पर ले जाने वाले जादूगरों की तस्वीर पेश की गयी।
मोदी ने आधुनिकता और विकास का मुखौटा पहन लिया ताकि सांप्रदायिक मंशाएं लोगो की निगाह से छिपी रहे। पुनरुत्थानवादी छवि को लोगों ने हाथों हाथ लिया और वे चुनाव जीत गए, और इसके बाद गुजरात मॉडल का कभी ज़िक्र नहीं हुआ।
आदित्यनाथ द्वारा, जो एक “संन्यासी” हैं, स्मार्ट शहरों, सेमीकंडक्टर उद्योग, या उच्च तकनीकी रक्षा प्रतिष्ठानों के बारे में बात करना अजीब नहीं है? ब्राह्मणवाद के विरुद्ध खड़े नाथ सम्प्रदाय के एक साधु होने के बावजूद वे उन सभी बातों का दम भरते हैं जो ब्राह्मणवाद को पुनर्स्थापित करती हैं। इन सबकी यात्रा में एकमात्र निरंतरता अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी नफरत में है।
इसके बगैर उनकी नैय्या पार नहीं लग सकती। लेकिन, यह विचारधारा भारतीय सभ्यता के उन सभी पहलुओं को नष्ट कर रही है जिसने प्राचीन काल से ही दुनियाभर के विभिन्न विचार संप्रदायों को पनाह दी है।
दुनिया के किसी भी धर्म या विचार को भारतीय विमर्श में अपनी गैर-मौजूदगी पर अफ़सोस नहीं करना चाहिए। संघ की विचारधारा इस मेल-मिलाप के बिल्कुल उलट है। वे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) की बात तो करते हैं, लेकिन ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक भाषा’ जैसी संकीर्ण सोच अपनाकर इस अवधारणा को खत्म कर देते हैं।
उम्मीद है कि संघ, भागवत की विदेश यात्रा से सही सबक सीखेगा और इस बात को समझेगा कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना लोगों को बाँटने वाली नफरती राजनीति के दायरे में नहीं समा सकती।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख वायर से साभार। अंग्रेज़ी से अनुवाद शुभम रौतेला। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)